भारत से भारतीयता की ओर

भारत से भारतीयता की ओर 

 देश को आजाद हुए आज 75 वर्ष हो गए है और इसी उपलक्ष में पिछले 75 सप्ताह से पूरा देश इसे आजादी के अमृत महोत्सव के रूप में मना रहा है। बहुत खुशी और गर्व की बात है कि 1947 में देश आजाद हो गया था । 1947 में आज ही के दिन विश्व पटल पर एक संप्रभु राष्ट्र का नाम उभरा 'भारत'। नई सुबह, नई उम्मीदों संग उस उल्लास को उत्स का रूप देकर हम प्रतिवर्ष 'स्वतंत्रता दिवस' मनाने लगे। मेरा जन्म आजाद भारत में हुआ इसलिए ईमानदारी से कहूँ तो शायद आज़ादी के लिए देशवीरों की कुर्बानियों का सटीक मूल्यांकन मैं नहीं कर सकता । किन्तु हाँ, बचपन में पड़े देशभक्ति के संस्कार और देशप्रेम के बीज से वो बलिदानियों की कहानियां वृक्ष की भांति दिल और दिमाग में गर्व के साथ गहरी पैठ जमाये हुई हैं। आधुनिकता के तूफान और शंका और सन्देह के रेतीले बवंडर भी हृदय सागर में उमड़ते देशप्रेम के उफान को कमजोर नहीं कर सकते। दिल में Feel हो तो will स्वतः दृढ़ हो जाती है। इसी फीलिंग और वीलिंग के कारण अतीत के आंचल में सिर रखकर जब आज के भारत का परिदृश्य देखता हूँ तो एक सिहरन उठ जाती है। स्वतंत्रता का आशय हम केवल एक ही दिन से समझते है और वो है, 15 अगस्त । वर्ष के शेष 364 दिनों में स्वतंत्रता से हमारा आशय केवल और केवल स्वच्छन्दता से रह जाता है। स्वतंत्रता को हम हमारी मनमर्जी से जोड़कर देखते हैं। किसी बुजुर्ग ने गलत बात के लिए टोक दिया तो उसे अपनी 'आजाद देश के आजाद नागरिक' के लोकप्रिय उद्धरण से रोक देंगे। भाषागत, आचारगत और सांस्कृतिक रूप से जब देश का विकृत विन्यास देखता हूँ तो लगता है क्या हमारे पुरखों ने यह आजादी हमें इसलिए दिलाई थी? क्या नेताजी सुभाष का स्वप्न इस भारत का था, क्या गांधीजी ने ब्रितानी हुकूमत के जुल्म, गालियाँ इस भारत के लिए सहन की थी, क्या लाला जैसे देश के लाल लाठियां खाते हुए इस हिन्द के लिए प्राणों की बलि दे गए, क्या भगत सिंह के भाव और चंद्रशेखर की मूंछों के ताव इस भारत के लिए इतने प्रखर थे। ऐसा लगता है कि उन्होंने 'भारत' को तो आजाद करवा दिया पर उनकी 'भारतीयता' पश्चिम की पकड़ से छूट नहीं पाई। इस ओर तब के देशप्रेमियों का ध्यान गया ही नहीं होगा क्योंकि तब 'भारत' गुलाम था पर 'भारतीयता' नहीं। यदि उनकी भारतीयता गुलाम होती तो वो संघर्ष के इस संग्राम में विदेशी हुकूमत से लड़ने की नहीं सोच पाते। औपनिवेशिक शासन के चंगुल से निकाल देश में ''अपने लोगों का शासन' तो हो गया किन्तु 'अपने लोगों के लिए शासन' में हम अभी सफल नहीं हो पाए। स्वराज मिल गया पर सुराज का सूरज आज भी बदलाव के बादलों और कमजोरी के कोहरे में हमसे आंख मिचौली कर रहा है। आज भी जब भारत में एकता, अखण्डता, समानता, समाजवाद और समतावाद की बात की जाती है, तो लगता है, यह सिद्धांत केवल संविधान की शोभा बन कर रह गए हैं। आज भी भारत में एक बच्चे को इतनी बुरी तरह से केवल इसलिए एक सवर्ण प्रिंसिपल द्वारा पीट-पीट कर मार दिया जाता है कि उस (दलित) बच्चे ने उसकी मटकी का जल पी लिया था। उस प्रिंसिपल के लिए प्रिंसिपल (सिद्धान्त) नाम की कोई चीज मायने नहीं रखती। वो बच्चा दलित नहीं वरन् दलित वो लोग हैं जो ऐसी पतित और घृणित सोच रखते हैं। वैसे भी बच्चे दलित नहीं, ललित होते हैं , उनका लालित्य किसी जातिगत कारा को नहीं स्वीकारता है। आज भी बीच राह कोई निर्भया क्रूर और निर्दयी भेड़ियों द्वारा नोंच ली जाती है और सजा के बजाय उस परिवार को बीच का रास्ता निकालने हेतु दबाव बनाया जाता है।कितने ही केस अदालतों में फाइलों में बरसों से धूल फांक रहे हैं। सरकारों की योजनाएं और बजट आवंटन केवल धनिकों के लिए है, गरीब और निम्न तबका तो इन भारी-भरकम बजट घोषणाओं द्वारा माल बटोरने का सरल माध्यम मात्र है। हम अपने अतीत पर गर्व महसूस करते हैं और करना भी चाहिए किन्तु भविष्य के लिए क्या हमारे पास कोई योजना है? शायद नहीं और यदि हम अपना भविष्य संवारना भी चाहते हैं और कोई नीति/योजना है भी तो उस में कोई मौलिकता नहीं है , केवल पश्चिम की बनी बनाई लीक पर चलना ही हम सीख पाए। 'वसुधैव कुटुंबकम्', 'सर्वे भवन्तु सुखिनः' जैसे आदर्श और दर्शन केवल विश्व के समक्ष बौद्धिक प्रदर्शन का माध्यम बन कर रह गए हैं। आज माटी की महक हमारी इंद्रियों के लिए एलर्जी , पावन बरसाती बूंदें बुखार, वायु से वीतराग वायरस का कारण कहलाता है। शायद आप कहेंगे, यह सब प्रदूषण के कारण हैं, मानता हूं मैं भी पर यह केवल जल/वायु/थल प्रदूषण नहीं है, यह है हमारा सांस्कृतिक प्रदूषण। खर-दूषण जैसे दानवों का वध करने तो ईश्वर ने अवतार ले लिया था पर इस प्रदूषण रूपी दानव के वध हेतु ईश्वर नहीं आएंगे। आना भी नहीं चाहिए, क्यों वे हमारे कुकर्मों की शुचिता का साधन बने? हमारी फैलाई गंदगी हमें ही साफ करनी होगी और करनी भी चाहिए और अगर ऐसा नहीं कर सकते तो हमें निर्मल वातावरण में रहने का भी कोई अधिकार नहीं है। यहाँ तो छोड़ो हमें तो राजनीति की शुचिता का भी कोई अवधान नहीं है। केवल कुर्सी और राज चाहिए, नीति और शुचिता के लिए न तो राजनैतिक दल पैरोकार रखते हैं और न ही उनको चुनने वाले मतदाता सरोकार रखते हैं। सरोकार है तो बस, उस सरकार से जो हमारे जातीय और वित्तीय हितों को साध सके। इतना लिखने के बाद भी मैं मानता हूं कि कुछ तो इस लेख को पढ़ेंगे ही नहीं, कुछ पढ़ेंगे तो थोड़ी-सी पंक्तियाँ पढ़कर नीरसता-वश पूरा पढ़ना निरस्त कर देंगे और कुछ देश के नाम पर ऊंघते हुए पढ़कर चलते बनेंगे। मुझे उनसे कोई लेना-देना नहीं है क्योंकि उनको केवल भारत देश की आजादी, जिसके बहाने वो केवल अपनी आजादी चाहते हैं, से मतलब है। ऐसे मतलबी इंसानों से परे कुछ लोग जो वाकई 'देश' के साथ 'देशवासियों', 'भारत' के साथ 'भारतीयता' को बचाना चाहते हैं, से आग्रह कि तनिक इस बारे में सोचे कि आज हमारे लिए आजादी के क्या मायने है? केवल सीमाओं के भीतर बंधे राष्ट्र के रूप में ही भारत पहचान के योग्य है? भारत सब की संप्रभुता की रक्षा करता है, 'जियो और जीने दो' में विश्वास करता है फिर भी तब भारत विश्व गुरु कहलाता था, आखिर क्यों और कैसे ? हालांकि भौगोलिक और भौमिक विस्तार हमारा कभी उद्देश्य नहीं रहा किन्तु हमें अपने आदर्शों और सनातन सिद्धान्तों का ध्वजवाहक तो बनना ही होगा , उनका विस्तार भी जरूरी है। हम हरण के विरोधी है पर आरोहण के नहीं। हमारे परिवेश और परवरिश पर पश्चिम का पैबन्द फैशन की तरह हमें भ्रमित करता जा रहा है। आज इस अमृत महोत्सव पर मूल्यों के अवमूल्यन के कारण होते हमारे पतन की ओर विचार करें ताकि 'भारत' और 'भारतीयता' दोनों की पहचान और अमिटता बनी रहे। 
 जय हिंद, जय भारत💐 

 कुलदीप सिंह भाटी

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